क्या है इंडिया फर्स्ट फॉर ग्लोबल गुड पॉलिसी? जिसका PM नरेंद्र मोदी ने जर्मनी में किया जिक्र

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पीएम मोदी यूरोप के दौरे पर हैं। इस दौरे पर उन्होंने जर्मनी में ‘इंडिया फर्स्ट फॉर ग्लोबल गुड’ सिद्धांत का जिक्र किया। इसके साथ ही उन्होंने ‘मेक इन इंडिया’ और ‘इंडिया फर्स्ट’ जैसे मसलों पर बातचीत की। पीएम नरेंद्र मोदी यूरोप में तीन देशों के दौरे पर हैं। इस दौरे पर उन्होंने जर्मनी में ‘इंडिया फर्स्ट फॉर ग्लोबल गुड’ सिद्धांत का जिक्र किया। जर्मनी में भारतीय मूल के लोगों से बात करते हुए पीएम मोदी ने भारत को वैश्विक समाधान प्रदाता या वैश्विक भलाई की शक्ति के तौर पर बताया। इसके साथ ही उन्होंने ‘मेक इन इंडिया’ और ‘इंडिया फर्स्ट’ जैसे मसलों पर बातचीत की। पीएम मोदी का ‘इंडिया फर्स्ट फॉर ग्लोबल गुड’ सिद्धांत पिछले कांग्रेस शासन के दौरान गुटनिरपेक्ष आंदोलन के साथ देश के जुड़ाव से बहुत दूर है क्योंकि यह एक सक्रिय सिद्धांत नहीं है। दुनियावी मामलों के एक्सपर्ट्स ने मौजूदा भारतीय विदेश नीति को रणनीतिक रूप से स्वायत्त, बहु-संरेखित, विशिष्ट मुद्दों पर गठबंधन के तौर पर परिभाषित किया है। यूक्रेन को लेकर यूनाइटेड नेशंस में भारत को रवैए को देखते हुए कुछ अभी भी भारत की गुटनिरपेक्षता के बारे में भ्रम में हैं। हालंकि तमाम दिक्कतों के बावजूद भारत अपनी रणनीति से समझौता किए बिना वैश्विक स्थिरता में सहयोग करने और सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार है। मोदी सरकार ने 100 से अधिक देशों को कोविड के टीके दिए। इसके साथ ही कोविड महामारी में दुनिया को दवाइयां भेजी। अफगानिस्तान, श्रीलंका और मालदीव सहित कई देशों को कई स्तर पर मदद कर रहा है। भारत अपने पड़ोसी देशों की हमेशा से मदद करता आया है चाहे वह सुनामी हो या महामारी या आर्थिक संकट। भारत जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में भी आगे बढ़ता है। इसके साथ ही भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में खुले समुद्र और  नेविगेशन की स्वतंत्रता का समर्थक है। भारत की इंडिया फर्स्ट रणनीति की असली परीक्षा ‘आत्मनिर्भर’ भारत की सफलता में है। भारत के लिए यह जरूरी है कि भारत रक्षा के लिए किसी और देश पर निर्भर न रहे। एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत यूक्रेन युद्ध से कतई खुश नहीं है लेकिन रूस से हथियार एक्सपोर्ट्स के कारण भारत यूक्रेन के पक्ष में खुलकर नहीं आ सकता। इंडियन नेवी का प्रोजेक्ट 75 या एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्सन सबमरीन प्रोजेक्ट की कल्पना 2009 में की गई थी लेकिन यह अब तक कागजों तक ही सिमटा हुआ है। इन महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स में देरी का मतलब भारत के लिए दिक्कतों का बढ़ना है। ऐसा होने से ‘इंडिया फर्स्ट’ और ‘मेक इन इंडिया’ जैसे प्रोजेक्ट्स पर सवाल उठते हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इंडिया फर्स्ट सिद्धांत केवल तभी आगे बढ़ सकता है जब भारत के प्राइवेट सेक्टर फ्रांस और अमेरिका जैसे भारत के करीबी सहयोगियों के साथ सहयोग कर रक्षा विनिर्माण क्षेत्र में भारत में निर्माण और तीसरे देशों को बिना किसी निर्यात नियंत्रण के निर्यात करे। फ्रांस बिना किसी शर्त के भारत में सफरन एयरक्राफ्ट इंजन बनाने को तैयार है और भारत ने अमेरिका को भी ऐसे प्रस्ताव दिए हैं। इंडिया फर्स्ट सिद्धांत की ताकत उभरती और महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी के भारतीय निर्माण की ताकत में निहित है।

Report- Akanksha Dixit.

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Author: uv24news

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