‘मशाल’ से शिवसेना का पुराना रिश्ता, जानें क्या है ‘धनुष-बाण’ मिलने की कहानी

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शिवसेना का मशाल से पुराना रिश्ता है। 1985 में छगन भुजबल इसी निशान से विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। उस वक्त छगन भुजबल शिवसेना नेता थे। 1989 में शिवसेना को धनुष बाण चुनाव निशान मिला था। शिवसेना के दो धड़ों में घमासान के बीच चुनाव आयोग ने उद्धव और शिंदे गुट को उपचुनाव के लिए धनुष बाण से इतर चुनाव निशान देने का फैसला किया। उद्धव गुट को मशाल का चुनाव निशान दे दिया गया है हालांकि शिंदे गुट के सुझाए निशानों से चुनाव आयोग संतुष्ट नहीं था। इसलिए शिंदे गुट से तीन अन्य विकल्प मांगे गए हैं। आपको जानकर हैरान होगी की यह पहली बार नहीं है जब शिवसेना मशाल चुनाव निशान पर चुनाव लड़ रही है। इससे पहले 1985 में भी शिवसेना को यही निशान दिया गया था और उसे सफलता भी मिली थी। छगन भुजबल ने तब मजगांव से मशाल के निशान पर चुनाव जीता था। बाद में भुजबल ने विद्रोह कर दिया और वे कांग्रेस में चले गए। छगन भुजबल इस समय राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में हैं। शिवसेना ने निकाय चुनाव और विधानसभा चुनाव के वक्त मशाल चुनाव निशान का इस्तेमाल किया था। बाल ठाकरे ने 1966 में शिवसेना का गठन तो कर दिया था लेकिन स्थायी चुनाव निशान मिलने में 23 साल लग गए। 1989 में शिवसेना को राज्य स्तर की पार्टी का दर्जा दिया गया। इसके बाद ही पार्टी को एक स्थाई चुनाव निशान रखने की अनुमति मिली।
शिवसेना में एकनाथ शिंदे के विद्रोह के बाद लगभग 33 साल बाद ऐसा हुआ है कि जब पार्टी का ‘धनुष बाण’ निशान फ्रीज कर दिया गया है। इसके अलावा चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को शिवसेना नाम का इस्तेमाल करने से भी रोका है। विकल्प मांगने के बाद चुनाव आयोग से शिंदे गुट को बालासाहेबांची शिवेसना और उद्धव गुट को, शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे नाम दिया गया है। शिवसेना के सांसद गजानन कीर्तिकर ने बताया 1967-68 में पहली बार पार्टी ने स्थानीय निकाय का चुनाव लड़ा था। तब अधिकतर प्रत्याशियों को ‘तलवार और ढाल’ का निशान मिला था। वहीं 1985 में ज्यादातर प्रत्याशियों को ‘मशाल’ चुनाव निशान मिला था। शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे पर कई किताबें लिखने वाले योगेंद्र ठाकुर ने कहा कि पार्टी के वरिष्ठ नेता मधुकर सारपोतदार ने 1985 में केरवाड़ी विधानसभा सीट पर चुनाव लड़ा था। बाल ठाकरे ने उनके लिए प्रचार भी किया था। उस वक्त मंच के किनारे मशाल जलाकर रखी गई थी ताकि लोगों को पता चल जाए कि किस निशान को देखकर वोट देना है।
1985 में जब महाराष्ट्र का विधानसभा चुनाव हुआ तो कुछ प्रत्याशियों को मशाल चुनाव निशान मिला था। वहीं कई उम्मीदवारों को बैट, सूरज, कप और तश्तरी निशान मिला था। छगन भुजबल ऐसे ही प्रत्याशी में से एक थे जिन्हें मशानलल चुनाव निशान दिया गया था। वहीं 1970 में उपचुनावके दौरान शिवसेना नेता ने उगता हुआ सूरज पर चुनाव लड़ा और सफलता हासिल की। बाद में 1988 में चुनाव निशान ने फैसला किया कि राजनीतिक पार्टियों को अपना रजिस्ट्रेशन कराना होगा। शिवसेना नेता सुभाष देसाई, ऐडवोकेट बाल कृष्ण जोशी की अगुआई में शिवसेना के रजिस्ट्रेशन के लिए दस्तावेज पेश किए गए। इसके बाद ही शिवसेना को धनुष बाण का निशान मिला। इसके बाद से अब तक शिवसेना नेता इसी निशान पर चुनाव लड़ रहे थे।

Report- Akanksha Dixit.

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Author: Akanksha Dixit

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