चुनावी नतीजों को लेकर परेशान नहीं… मार्गरेट अल्वा बोलीं- ममता बनर्जी के पास विचार के लिए पर्याप्त समय

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उपराष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार अल्वा ने कहा, मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं राजनीति में आऊंगी। हालांकि, मैं छात्र राजनीति में काफी सक्रिय थी। मेरी शादी एक राजनीतिक घराने में हो गई और मैं दिल्ली आ गई। उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष की संयुक्त उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा ने गैर-भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दलों में लगातार बढ़ रहे मतभेद और संख्या बल उनके पक्ष में नहीं होने के बीच कहा कि वह चुनावी नतीजों को लेकर बिल्कुल भी परेशान नहीं हैं, क्योंकि वोटों का गणित कभी भी बदल सकता है। उन्होंने कहा कि हम यह कहकर पीछे नहीं हट सकते कि हमारे पास पर्याप्त संख्या बल नहीं है, इसलिए हम चुनाव नहीं लड़ेंगे। जहां तक बात ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के मतदान से दूर रहने की है तो उनके पास फिर से विचार करने के लिए पर्याप्त समय है।
उपराष्ट्रपति चुनाव में एक पखवाड़े से भी कम समय बचा होने के बीच उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि ममता बनर्जी के पास उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के मतदान से दूर रहने संबंधी फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए पर्याप्त वक्त है। अल्वा ने कहा, ‘जब मैं आसपास देखती हूं तो काफी डर लगता है। आप जो चाहते हैं, वह खा नहीं सकते। आप जो चाहते हैं, वह पहन नहीं सकते। आप जो चाहते हैं, वह कह नहीं सकते। आप उन लोगों से मिल भी नहीं सकते, जिनसे आप मिलना चाहते हैं। यह कैसा समय है?’ अल्वा सोमवार को संसद भवन के सेंट्रल हॉल में विभिन्न दलों के सांसदों से मुलाकात कर उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए अपना अभियान शुरू करेंगी। निर्वाचक मंडल का गणित स्पष्ट रूप से विपक्ष के खिलाफ है ऐसे में हारी हुई लड़ाई क्यों के सवाल के जवाब में अल्वा ने कहा, चूंकि, संख्या बल हमारे पक्ष में नहीं है, इसलिए हमें चुनाव नहीं लड़ना चाहिए? मेरा मानना है कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में, जीत हो या हार, आपको चुनौती स्वीकार करनी होगी और उन सांसदों के सामने अपनी बात रखनी होगी, जो अब निर्वाचक मंडल का हिस्सा हैं। हमारा सरकार से अलग नजरिया है और जरूरत उन लोगों की है, जो चुनौती को स्वीकार करने के लिए एक साझा मंच पर हैं। अल्वा ने कहा, ‘विपक्षी दलों ने इस चुनाव में अपना उम्मीदवार बनने के लिए मुझसे संपर्क किया था। मैं भले ही बेंगलुरु में जा बसी थी, लेकिन मुझे महसूस हुआ कि इस चुनौती का सामना करना होगा और मैंने हां कर दी। हम सभी समझते हैं कि जीत और हार चुनाव का हिस्सा हैं। वहीं ममता बनर्जी के फैसले को लेकर उन्होंने कहा कि, मैं इस घोषणा से स्तब्ध हूं। ममता बनर्जी विपक्ष को एकजुट करने के अभियान की अगुवाई करती रही हैं। वह पिछले कई वर्षों से मेरी दोस्त हैं और मेरा मानना है कि उनके पास अपना फैसला बदलने के लिए पर्याप्त समय है। संभावित नतीजों से वाकिफ होने के बावजूद उपराष्ट्रपति चुनाव लड़ने के पीछे के मकसद वाले सवाल के जवाब में अल्वा ने कहा, मेरा कोई व्यक्तिगत मकसद नहीं है। विपक्षी दल एक ऐसा उम्मीदवार चाहते थे, जो सभी को स्वीकार्य हो। इसलिए उन्होंने मुझसे अपना प्रत्याशी बनने का आग्रह किया। और भले ही वर्तमान में संख्या बल विपक्ष के पक्ष में नहीं है, मैंने हां कर दी और यह चुनौती स्वीकार कर ली।

Report- Akanksha Dixit.

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Author: uv24news

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